Poem: मैं ये दीवाली मनाऊँ तो मनाऊँ कैसे

वो भाई जिनके साँथ मिलकर आजादी की लड़ाई लड़ीं

आज वो खुद दुश्मन बना बैठा है

वो अपने ना पाक इरादों से

बस कुछ जमीन के टुकड़ों के लिए

हर रोज खून से खेल रहा है

इस खून से भरी जमीन पर

मैं दीवाली मनाऊँ तो मनाऊँ कैसे

 

मैं ये दीवाली मनाऊँ तो मनाऊँ कैसे

 

माँ को तो बस उसके आने का इन्तजार है

मगर वहाँ तो छुट्टियों का बुरा हाल है

मेरा वो सरहद पर खड़ा भाई

उसके बिना मैं दीवाली मनाऊँ तो मनाऊँ कैसे

 

मैं ये दीवाली मनाऊँ तो मनाऊँ कैसे

 

सरहद पर सकती हो गई है

हर वक्त उन्गलियाँ ट्रिगर पर हो गई है

मगर बस फर्क इतना है

एक ने बन्दूक बचाने के लिए उठाइ  है

तो दूसरे ने मारने के लिए

इस गरमा गरमी मे, मैं दीवाली मनाऊँ तो मनाऊँ कैसे

 

मैं ये दीवाली मनाऊँ तो मनाऊँ कैसे

 

आँखों मे नींद का अब कोई ठिकाना नहीं है

जो कल तक भाई था वो अब दुश्मन बन चुका है

वो सोते हुए पर भी वार कर रहा है

अपने भाइयों की लाशों का भी चीड़ फाड़ कर दे रहा है

सरहद से लौटीं शहीदों की लाशों के मातम पर

मैं दीवाली मनाऊँ तो मनाऊँ कैसे

 

मैं ये दीवाली मनाऊँ तो मनाऊँ कैसे

 

क्यों ना मारें हम घुसकर

हमारी माँ के आँसुओं का सवाल है

हर वो एक तिरंगे मे लिपटीं हुई शहीद की शहादत का सवाल है

कीमत तो अब चुकानी होगी

लाशों के बदले लाशें बिछानी होगी

बदले की आग मे झुलसती हुई ये आँखें

मेरे से कह रही है मैं दीवाली मनाऊँ तो मनाऊँ कैसे

 

मैं ये दीवाली मनाऊँ तो मनाऊँ कैसे

Description: The poem is representing the voice of every citizen of country who care for their loved one’s standing on the border. Every day one or two soldiers are killed by the enemy country by cheating, they have habit of stabbing in back. All those army person standing on the border are our brother and how a celebration can complete without a member of a family.

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